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ट्रंप-नमो का सामंजस्य और ड्रेगन की भड़ास

ट्रंप-नमो का सामंजस्य और ड्रेगन की भड़ास

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 प्रवीण गुजनानी जून 2016 के अपनें अमेरिका प्रवास के दौरान अमेरिकी संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत अमेरिका सम्बंध इतिहास की झिझक से बाहर आ गए हैं. इस बार नमो के अमेरिका प्रवास में ट्रंप से भेंट के पश्चात वैश्विक समुदाय को यह स्पष्ट संदेश प्रसारित हो गया कि "भारत अमेरिका सम्बंधों में झिझक अब इतिहास की बात हो गई है. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की व्हाईट हाउस से विदाई के बाद भारत अमेरिकी राष्ट्राध्यक्षों के मध्य जीवंत सम्बंधों में कमी आनें की आशंका बड़े पैमानें पर व्यक्त की जा रही थी. नवनियुक्त अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने व्हाईट हाउस में प्रवेश के साथ ही जिस प्रकार के क्रांतिकारी संकेत दिए, अमेरिका व अमेरिकी फस्र्ट का नारा दिया, पिछले दिनों जिनेवा में पर्यावरण के विषय पर जिस प्रकार का आश्चर्यजनक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया
मोदी-ट्रंप: जबानी जमा-खर्च ?

मोदी-ट्रंप: जबानी जमा-खर्च ?

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यह पहली मुलाकात इतनी सरस होगी, इसकी संभावना पर सभी को शक था लेकिन ट्रंप ने जैसा भावभीना स्वागत किया, उसने सभी संदेहों को दूर कर दिया है। दोनों नेताओं के बीच जैसा वार्तालाप हुआ, दोनों ने जैसा संयुक्त वक्तव्य जारी किया और जैसी संयुक्त पत्रकार-वार्ता की, उससे सभी विश्लेषकों को यह मानने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है कि ट्रंप के अमेरिका के साथ भारत के संबंध उतने ही घनिष्ट अब भी हैं, जितने कि वे जार्ज बुश और ओबामा के ज़माने में रहे हैं। बल्कि जऱा ज्यादा स्पष्टवादिता आई है। जैसे पाकिस्तान से दो-टूक शब्दों में कहा गया है कि वह पड़ौसी देशों में आतंक फैलाने से बाज आए। इसके अलावा हिजबुल मुजाहिद्दीन के मुखिया सलाहुद्दीन को आतंकवादी घोषित करना और मोदी के वाशिंगटन पहुंचने पर करना, अपने आप में एक तोहफा है। मोदी ने ट्रंप
मुक्तिबोध की धरती पर स्थानीय साहित्यकारों की उपेक्षा क्यों?

मुक्तिबोध की धरती पर स्थानीय साहित्यकारों की उपेक्षा क्यों?

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साहित्य अकादमी के नाम नवप्रदेश का खुला खत यशवंत धोटे रायपुर (नवप्रदेश)। 13 नवंबर 2017 को हिन्दी के शीर्ष कवि और आलोचक गजानन माधव मुक्तिबोध शताब्दी पुरूष हो जाएंगे। इस वर्ष उनकी याद में साहित्यिक जगत में आयोजनों का सिलसिला शुरू हो गया है। यह स्वागतयोग्य है। छत्तीसगढ़ के लिए यह गौरव है कि 47 वर्ष के अल्पजीवन में मुक्तिबोध आखिरी के छह बरस राजनांदगांव के दिग्विजय महाविद्यालय के प्राध्यापक रहे थे। राजनांदगांव में उनकी तबीयत बिगड़ी और 1964 में वे चले गए। मुक्तिबोध वह लेखक हैं जिनकी ख्याति उनके मरने के बाद यक-ब-यक भूकंप की तरह फैली। आज भी वे अपनी साहित्यिक ऊंचाई की पहली पायदान पर हैं। दिग्विजय महाविद्यालय के अध्यापन के दिनों में मुक्तिबोध से कई वरिष्ठ लेखक और बुद्धिजीवी प्रशंसा करते मिलते रहे। कई ने उनकी उपेक्षा भी की। कई ने उनकी पीठ पर वार भी किया। छत्तीसगढ़ के डा. प्रमोद वर्मा मुक्तिबोध के
नेताओं के अहं की मालिश

नेताओं के अहं की मालिश

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक हवाई जहाजों में यात्रा करते वक्त हमारे नेताओं को क्या च्प्रोटोकाॅलज् (विशेष व्यवहार) मिलना चाहिए, इसे लेकर नागर विमानन मंत्रालय ने सभी गैर-सरकारी हवाई कंपनियों की एक बैठक बुलाई है। अब एयर इंडिया भी बिकनेवाली है, इसीलिए नेताओं को अपने प्रोटोकाॅल की चिंता सता रही है। यदि देश में कोई सरकारी हवाई कंपनी ही नहीं रहेगी तो नेताओं के नखरे कौन उठाएगा ? अब गैर-सरकारी हवाई कंपनियों को भी मजबूर किया जाएगा कि वे नेताओं की अगवानी दूल्हों की तरह किया करें। जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधि जहाज या रेल से यात्रा करते हैं तो लगता है कि वे हमारे लोकतंत्र पर तमाचा जड़ रहे हैं। एक तो उनकी यात्रा मुफ्त होती है। उनका किराया हम भरते हैं। वह हमारे टैक्स के पैसों में से जाता है। फिर उन्हें बिजनेस क्लास और फर्स्ट क्लास में सीटें दी जाती हैं। सबसे अगली सीट पर कब्जा करने के लिए वे बेताब रहते हैं। उनका
ये जाति क्यों नहीं जाती

ये जाति क्यों नहीं जाती

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योगेश मिश्र हमारा संविधान यह बताता है कि राज्य अपने नागरिकों के मध्य मूलवंश, धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर किसी प्रकार का भेद नहीं करेगा। यह सरकारों के कामकाज के नतीजों का ही तकाजा है कि उसने जिसे भी अपने एजेंडे का हिस्सा बनाया या तो अर्थहीन और कांतिहीन हो गया। अथवा हथियार बन गया। सरकार ने भाषा, क्षेत्र, किसान, गाय, गंगा, पर्यावरण, जाति, धर्म आदि इत्यादि को जब जब अपने एजेंडे में शरीक किया। इसके बाद से ये उध्र्वगति की जगह ठीक उल्टी दिशा में यात्रा करने को विवश हुए। हमारे राजनीतिक दल और उसके नामचीन नेता संविधान के संवाहक हैं। ऐसे में उनसे इतनी उम्मीद करना बेमानी नहीं है कि वे संविधान की मंशा का अनुपालन करें। मूलवंश, धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर नागरिकों के बीच विभेद न करें। राजनेताओँ की कृपादृष्टि इनमें धर्म और जाति को छोड़कर अभी तक किसी पर नहीं पड़ी है। जाति पर उनकी इतन
पत्रकारों की आज़ादी और साख

पत्रकारों की आज़ादी और साख

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक कल दिल्ली के प्रेस क्लब में पत्रकारों का बड़ा जमावड़ा हुआ। कुछ दिन पहले एनडीटीवी के सिलसिले में भी हुआ था। मैंने ऐसा जमावड़ा पूरे 42 साल पहले यहां देखा था। 26 जून 1975 को आपात्काल की घोषणा हुई थी और उसके दो-तीन दिन बाद ही श्री कुलदीप नय्यर की पहल पर हम दो-तीन सौ पत्रकार जमा हो गए थे। आपात्काल के विरुद्ध भाषणों के बाद जब कुलदीपजी ने कहा कि आपात्काल और सेंसरशिप के निंदा-प्रस्ताव पर सब दस्तखत करें तो देखते-देखते ही आधा हाॅल खाली हो गया। मैंने और भाई प्रभाष जोशी ने सबसे पहले दस्तखत किए। कल मुझे फिर लगा कि इस कार्यक्रम के युवा आयोजकों ने भावी आपात्काल की चेतावनी देने के लिए इतना बड़ा आयोजन किया है लेकिन लगभग आधा दर्जन वक्ताओं ने पत्रकारिता का स्तर कैसे अच्छा बनाएं, इसी विषय पर जोर दिया। वहां लगभग सभी हिंदी पत्रकार थे। श्री रामबहादुर राय के इस सुझाव का मैंने अध्यक्षीय वक्तव्य मे
देश को याद करायी जाएंगी आपातकाल की ज्यादतियाँ

देश को याद करायी जाएंगी आपातकाल की ज्यादतियाँ

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डॉ. सुशील त्रिवेदी भारतीय जनता पार्टी यह चाहती है कि देष की नई पीढ़ी यह जाने कि कांग्रेस ने किस तरह लोकतंत्र पर हमला किया था और लोगो के मौलिक अधिकार तथा आजादी छीन ली थी। आज का युवा हर घटना की तत्क्षण जानकारी पा जाता है और उस पर प्रतिक्रिया भी दे देता है। आज का युवा यह जानता है कि सोषल मीडिया के द्वारा राजनीतिक क्रांति लाई जाती है, उसके लिए यह भरोसा करना कठिन है कि देश में समाचार पत्रों और रेडियो पर समाचारों पर सेंसरशिप लगाई गयी थी और यह कि उस समय केवल मौखिक संचार से ही और व्यक्तिगत संपर्कों के द्वारा देश में पुन: लोकतंत्र स्थापित कर दिया था। देश की जनता और विशेष कर युवाओं को आपातकाल के अंधेरे की याद कराने के लिए नरेद्र मोदी की सरकार के मंत्री पूरे देष भर में 25 जून को सभाएं करेंगे । वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और आपातकाल में मीसा बंदी बनाये गये नेताओं को साथ लेकर यह अभियान चलाएंगे। भ
अब तक भोग किया, अब योग करें

अब तक भोग किया, अब योग करें

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक योग दिवस पर कुछ कांग्रेसी मित्रों ने योग और मोदी का मजाक बनाया है। मोदी की जो भी आलोचना उन्हें करना है, वह जरुर करें। वरना वे विपक्षी कैसे कहलाएंगे ? लेकिन योग और योग-दिवस के बारे में तो मैं उनसे उत्तम प्रतिक्रिया की उम्मीद करता था। मैं तो सोचता था कि कांग्रेसी मित्र लोग भी बढ़-चढ़कर योग-दिवस मनाएंगे और इस विश्व-व्यापी कल्याण-कार्य पर अकेले मोदी की छाप नहीं लगने देंगे लेकिन राजनीति तो ऐसी ईष्र्यालु प्रेमिका है कि वह विश्व-कल्याण को भी बर्दाश्त नहीं कर सकती। इस समय योग की सबसे ज्यादा जरुरत किसी को है तो वह कांग्रेसी नेताओं को है। राहुल को है, हमारे मित्र दिग्गी राजा को है, शशि थरुर को है, गुलाम नबी को है। किसको नहीं है ? ये लोग योग को क्या समझे बैठे हैं ? ये लोग उठक-बैठक, अनुलोम-विलोम, शीर्षासन-पद्मासन को ही योग समझे बैठे हैं। ये योग जरुर हैं लेकिन यह योग का सिर्फ एक-चौ