शहर के अंदर तेज रफ्तार दौड़ती हैं सिटी बसें

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बिलासपुर, (नव प्रदेश)। शहर के अंदर दौड़ती खटारा सिटी बसों में ठूस कर यात्रियों को चढ़ाया जाता है, जिसे देख यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भविष्य में ऐसी लापरवाही एक दुर्घटना होने का संकेत दे रही है। बसों के शीशे, सीट और सहारा के लिए पकडऩे वाला हैंडल टूट चुका है, जिन्हें रस्सी से बांधकर काम चलाया जा रहा है।
स्मार्ट सिटी का सपना लिए जिन योजनाओं को लागू किया गया उसकी शुरुआत के बाद जिला प्रशासन का अमला दुबारा ध्यान नहीं दे रहा है। शहर के नागरिकों को रिक्शा, ऑटो के महंगे किराया से राहत देने कम दर पर महानगरों की तर्ज पर सिटी बसों का संचालन किया जा रहा है। बसों की संख्या में बढ़ोतरी करते हुए दस एसी, चालीस नॉन एसी कुल 50 बसें रेलवे स्टेशन से तखतपुर, कोटा, गनियारी, रतनपुर, सीपत, बिल्हा, मस्तूरी व मल्हार रूट में तीन-तीन फेरों में चलाई जा रही है। किराया कम होने से इन बसों में यात्रियों की काफी भीड़ रहती है जिनमें पैर रखने तक जगह मुश्किल से मिल पाता है। यात्री बिलासपुर से सीपत, कोटा, तखतपुर जहां तक बसों की आखिरी स्टापेज है यात्री खड़े होकर सफर करते हैं। इसके बावजूद ठेका ली हुई कंपनी घाटे का रोना रोकर बसों की मेंटनेंस में ध्यान देना जरुरी नहीं समझ रहा है। क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाकर नियमों का दरकिनार कर रहे हैं। बसों की हालत इतनी खस्ताहाल हो गई है कि सीटों के पुर्जे निकल गए। खड़े रहकर सहारा के लिए पकडऩे वाला हैंडल टूट चुका है, जिसे रस्सी से बांधकर काम चलाया जाने लगा है। बसों की ऐसी स्थिति और यात्रियों से भरी सरपट दौड़ती सिटी बसों को देखकर ऐसा लगता है कि किसी बड़ी दुर्घटना होने का संकेत है। नगर निगम की बसों को ठेका में लिए श्री दुर्गाम्बा कंपनी के मेनेजर लक्ष्मीकांत से संपर्क कर उनसे बसों की मेंटनेंस की जानकारी ली गई तो उन्होंने कहा कि शहर की जिस रुट में बस चल रही है उन सड़कों की हालत बदहाल है, जिस वजह से रोजाना बसों की टायर या फिर चेचिस खराब हो रहे हैं। कंपनी जो कमा रही है वो सारा पैसा कर्मचारियों को देने और मरम्मत में ही खर्च हो जाता है। इसके अलावा नगर निगम को अलग पेनाल्टी देनी पड़ती है। सिटी बसों से कंपनी को उल्टा घाटा सहना पड़ रहा है। शुरुआती दिनों में 15 से 20 हजार रोजाना कमाई होता रहा, जो घटकर वर्तमान में 10 हजार अधिकतम है।

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