नए वर्ष में तमाम नेता और ज्यादा आक्रामक होंगे

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बिलासपुर, (नव प्रदेश)
नए वर्ष की शुरुआत आज से हो रही है। हर कोई एक दूसरे की मंगल कामना करते हुए शुभकामनाएं भेजते हैं, मगर छत्तीसगढ़ की राजनीति में यह संभव नहीं है और वर्ष 2018 में तो कतई भी नहीं, क्योंकि चुनावी वर्ष है इस लिहाज से राजनैतिक नेता एक-दूसरे को फलने-फूलने बधाई देने के बजाए पूरे वर्ष भर जुबानी जंग और पटखनी देने तथा राजनीति में स्थापित चाल, चरित्र को तार-तार कर देने के भी प्रयास किए जाएंगे। पुराने दर्ज मामलों की फाइल भी खुलेगी। एक-दूसरे को चौतरफा घेरने तथा छत्तीसगढ़ की जनता के समक्ष दागदार घोषित करने की कोशिश होगी। गुजरात के चुनाव ने इन सारे हथकंडों को अपनाने के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया है।
प्रदेश में सत्तारुढ़ दल भाजपा, प्रमुख विपक्षी दल कांगे्रस और बसपा, आम आदमी पार्टी आदि के नेता एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई देते हुए सुख समृद्धि के लिए शुभकामनाएं देंगे भी की नहीं इसमें संदेह है।
नए वर्ष के शुभारंभ को तमाम राजनैतिक दल के नेता चुनावी वर्ष की शुरुआत मानते हुए एक-दूसरे पर हमले को और तेज कर देंगे। सत्तारुढ़ दल भाजपा की तैयारी तो सालभर पहले से शुरु हो चुकी है। कांगे्रस में नए प्रदेश प्रभारी आ गए हैं। सामूहिक हमले की दृष्टि से भाजपा-कांगे्रस पर भारी है। गुजरात चुनाव में जिस तरह के नतीजे आए हैं उससे अंदरूनी तौर पर भाजपा नेता संतुष्ट नहीं हैं और इसे खतरे की घंटी मानते हुए सतर्क हो गए हैं। वर्ष के अंत में जिन राज्यों में चुनाव है वहां सर्वे कराकर अभी से डेेमेज कंट्रोल के लिए कवायद शुरु कर दी गई है। भाजपा संगठन के राष्ट्रीय नेताओं रामलाल अग्रवाल, सौदान सिंह ने तो अभी से डेरा डाल दिया है। बस्तर से सरगुजा तक दोनों नेताओं की निगाहें हैं।
भाजपा की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने स्तर पर डेमेज कंट्रोल करने और भाजपा को मजबूत करने सक्रिय हो गया है। गुजरात में 6 माह पहले ही संघ के कार्यकर्ता पूरे प्रदेश में सक्रिय हो गए थे उसके बाद भी जो परिणाम आया है उसे देख भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व कोई रिस्क नहीं लेना चाहता।
भाजपा संगठन और सरकार के पास चुनावी नेतीजे अपने पक्ष में करने के लिए बड़ी फौज है और फिर भाजपा से संबद्ध विहिप, हिंद सेना, बजरंग दल, अभाविप जैसे दर्जनों छुपे हुए संगठन हैं जो चुनाव के समय अपने स्तर पर भाजपा के लिए समर्पित होकर काम करते हैं। सरकार के कामकाज भी वोटरों को प्रभावित करते हैं। इस मामले में डा. रमन सिंह सरकार को कोई अक्षम नहीं ठहरा सकता। रमन सिंह सरकार का रिपोर्ट कार्ड जनता के समक्ष उजला पक्ष ही साबित होगा। इसके ठीक विपरित विपक्षी दल कांगे्रस के पास प्रभावी नेताओं की कमी है। पीएल पुनिया और भूपेश बघेल इन दो नेताओं के कंधे पर कांगे्रस का पूरा दारोमदार रहेगा।
डा. चरण दास महंत, सत्यनारायण शर्मा, धनेंद्र साहू जैसे नेता भाजपा नेता जैसे आक्रामक नहीं हैं। इन्हें सौम्य नेता के रुप में जाना जाता है। सिर्फ भूपेश बघेल ने ही अपनी छवि आक्रामक नेता के रुप में बनाया है। सरकार पर अनेक घोटाले और जनविरोधी होने का आरोप लगा। आक्रामक होने के बाद भी प्रदेश की भाजपा सरकार को कांगे्रस के नेता न तो डिगा पाए और न ही विचलित कर पाए हैं। तमाम तरह के आरोपों के बीच प्रदेश भाजपा सरकार को बीते चार वर्षों में कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गए। कांगे्रस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस रणनीति के तहत गुजरात का चुनाव लड़कर कांगे्रस की सीटों में बढ़ोतरी की है उसी रणनीति पर छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव लडऩे की कोई योजना हो सकता है आगे चलकर कांगे्रस के नेता भी बनाए, लेकिन इतना तो निश्चित है कि कांगे्रस नेताओं और सरकार के बीच अब सहज संबंध नहीं रह गया है। यह मनमुटाव चुनाव आते-आते और भी गहराएगा। इधर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी अगले संभावित सरकार में अपनी अहम लेकिन अपरिहार्य भूमिका के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में वे अपनी पार्टी का जनाधार बढ़ाने के बजाए ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में वे चुनाव के ठीक पहले सक्रिय होंगे। श्री जोगी चाहते हैं कि उनकी पार्टी छजकां को राज्य में इतनी सीटें मिल जाए कि उसका समर्थन लिए बिना किसी की भी पार्टी की सरकार न बन सके। चुनाव नजदीक आते-आते कई तरह के राजनीतिक समीकरण बनेंगे और बदलेंगे, मगर इतना जरुर है कि वर्ष 2018 में तमाम दलों के नेताओं के बीच आपसी सौहाद्र बढऩे के बजाए एक-दूसरे के प्रति और ज्यादा आक्रामक होंगे, क्योंकि सत्ता सबको चाहिए।

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