दो तरह के पटेल: कौन मोदी के साथ और कौन हार्दिक संग?

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अहमदाबाद। गुजरात विधानसभा 2017 की चुनावी जंग अब अपने आखऱिी पड़ाव में पहुंच चुकी है. ऐसे हालात में गुजरात राज्य की राजनीति में एक सामाजिक और राजनीतिक लहर सी है. अब इस लहर की दिशा और दशा पाटीदारों पर दारोमदार रखती है, ऐसा कई राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है. आइए समझने की कोशिश करते हैं कि गुजरात विधानसभा चुनाव की दशा और दिशा पाटीदार क्यों तय करेंगे? गुजरात में तकरीबन 4 करोड़ 35 लाख मतदाताओं में 1 करोड़ से ज़्यादा मतदाता पटेल पाटीदार बिरादरी से हैं जो कि किसी राज्य के जाति या वर्ण आधारित मतदाताओं की 22-23त्न संख्या हुई.्र
क्या है कड़वा और लेउवा पटेल?
हालांकि, गुजरात में पाटीदार-पटेल समुदाय दो वर्णों में बंटा हुआ है. कड़वा पाटीदार पटेल और लेउवा पाटीदार पटेल. हार्दिक पटेल खुद कड़वा पटेल हैं और हाल के गुजरात के शासन में सत्तारुढ़ पटेल-पाटीदार नेताओं में कड़वा पटेल नेताओं की संख्या ज़्यादा है. पाटीदार-पटेल भले ही दो वर्णों में हों, पर उनका मूल व्यवसाय और उनकी आर्थिक आय, खेती, पशुपालन और डेरी सहकारी क्षेत्र पर आधारित है. लेउवा पटेल ज़्यादातर सौराष्ट्र-कच्छ इलाके (गुजरात के पश्चिम तटीय क्षेत्र का इलाका) के राजकोट, जामनगर, भावनगर, अमरेली, जूनागढ़, पोरबंदर, सुरेंद्रनगर, कच्छ जि़लों में ज़्यादातर पाए जाते हैं. जबकि कड़वा पटेल समुदाय के लोग उत्तर गुजरात के मेहसाणा, अहमदाबाद, कड़ी-कलोल, विसनगर इलाके में पाए जाते हैं. कड़वा पाटीदार की कुलदेवी उमिया माता हैं जबकि लेउवा पटेलों की कुलदेवी खोडियार माता हैं. कड़वा पाटीदारों का सबसे बड़ा धार्मिक संस्थान उत्तर गुजरात के उंझा गांव में मां उमिया संस्थान के नाम से प्रचलित है. जबकि लेउवा पाटीदारों का सबसे बड़ा धार्मिक संस्थान सौराष्ट्र के कागवड गांव में मां खोडलधाम के नाम से प्रचलित है. ऐसे में अगर ये 1 करोड़ से ज़्यादा मतदाताओं का अनुपात कड़वा और लेउवा पाटीदार के रूप में देखें तो कड़वा पटेल 60 प्रतिशत और लेउवा पटेल 40 प्रतिशत हैं.
फिर से पटेल : हालांकि, 1990 और 90 के मध्य दशक में पटेलों का वर्चस्व गुजरात की राजनीति और सामाजिक जीवन में अपनी चरमसीमा पर था. उस समय कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के हाथों में गुजरात की राजनीतिक कमान थी. ऐसे में 1995 में सत्ता ने करवट ली और पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात की राजनीतिक बागडोर संभाली. हालांकि, जनसंघ के समय से गुजरात की राजनीतिक कमान संभालने का ख्वाब भारतीय जनता पार्टी देख रही थी. 1952 में राजकोट में चिमनभाई शुक्ला ने पार्टी का पहला दीपक (जनसंघ का चुनाव चिन्ह दीपक) जलाया था. 1990 के रामजन्मभूमि आंदोलन को लेकर सोमनाथ से शुरू की गई अयोध्या यात्रा की पृष्ठभूमि पर जब हिंदुत्व की लहर ज़ोरों से चल रही थी, तब भारतीय जनता पार्टी ने केशुभाई पटेल को एक पाटीदार चेहरे के तौर पर जनता के सामने पेश किया और बाकी फिर सब इतिहास है. 1995 में भारतीय जनता पार्टी को 182 में से 121 सीटें मिलीं और तब से पाटीदार-पटेल मतदाताओं को साथ रखकर भारतीय जनता पार्टी गुजरात में 1998 से लेकर आज तक लगातार चार बार अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही है।

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