वकालत में भी सब कुछ हरा हरा नहीं है

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कनक तिवारी
9425220737
क्रमांक-10

न्यायाधीश से दैनिक संपर्क के कारण वकील उनके वास्तविक आलोचक हो सकते हैं। अनुभव लेकिन बताता है कि अधिवक्ता परिषदों पर अधिकतर ऐसे वकीलों का कब्ज़ा होता है जो मुकदमे लडऩे अदालतों में लगातार नहीं जाते। उन सभी तिकड़मों से वाकिफ होते हैं जिनसे चुनाव जीते जा सकते हैं। प्रेस के संवाददाता न्यायालयों में उपस्थित रहकर भी कई बार कार्यवाहियों का मर्म तक नहीं समझते। वे अभिव्यक्ति की अधिकारिता रहते सद्भावनाजन्य टिप्पणियां तक लिखने से कतराते हैं। उन्हें अवमानना अधिनियम का भूत डराने लगता है। अन्य बुद्धिजीवी ज्ञान की बाकी विधाओं को वैसे तो नदियों की संज्ञा देते हैं, लेकिन अदालतों को डर के कारण तालाब की तरह समझते हैं। न्यायाधीशों के प्रति आरोपों को लेकर अधिवक्ता परिषदों में बहसमुबाहिसा कई बार निजी स्वार्थों और जान पहचान के आधार पर निपटता रहता है। यह सब विवादित न्यायाधीश को लेकर भी उचित नहीं है क्योंकि न्यायाधीश के व्यक्तित्व के चरित्र की जांच को लेकर उसके पद की गरिमा और महत्ता को असुरक्षित नहीं किया जा सकता। दुखद यह है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में दोषी न्यायाधीशों को दंडित करने अथवा उसकी युक्तियुक्त जांच प्रणाली विकसित करने की स्थिति अब भी नहीं है। न्यायाधीश खुद ऐसी जांच कराने से कतरा रहे हैं। इन दिनों अधिवक्ता व्यवसाय की नैतिक और व्यावहारिक हालत भी अच्छी नहीं है। अधिवक्ता परिषद की अधिकतर बैठकों में उत्तेजना, शक्ति प्रदर्शन और अभद्रता के आचरण की पहले से ही आशंका होती है। संतुलित व्यवहार करने वाले वकील अल्पसंख्यकों की तरह उपेक्षित महसूस करते रहते हैं। कई फैसले सामाजिक उद्देश्यों के बदले निजी स्वार्थों की वजह से किए जाते हैं। फिर उन पर समाज सेवा का मुलम्मा चढ़ाया जाता है। लाखों मुकदमे करोड़ों व्यक्तियों का जीवन दूभर किए हुए हैं। हजारों वकील सैकड़ों न्यायाधीशों से लाखों मुकदमों में न्याय पाने की वह पहल नहीं कर पाते, जो अंतत: समाजोन्मुखी हो। न्यायालय के अतिरिक्त अन्य विभागों में आधुनिकता, टेक्नॉलॉजी, कम्प्यूटर, इंटरनेट, व्यापार-प्रबंधन सभी कुछ इस्तेमाल हो रहा है। न्यायदान की पद्धति उसी पुरानी ढपली पर अपना राग गा रही है। वहां सब कुछ शिथिल, अपरिवर्तनीय और पारम्परिक दिखाई देता है। प्रकरणों को बढ़ाते रहने के इतने बहाने होते हैं कि कभी भी यह सुनिष्चित नहीं हो पाता कि वह दिन कब होगा जब न्यायाधीश और अधिवक्ता मिलकर भी मुकदमे की सुनवाई कराने से बच नहीं पाएंगे।
राजनीति और नौकरशाही में वंशवाद का आरोप खूब फल फूल रहा है। न्यायपालिका में भी बड़े पिताओं की सन्तानों को नियुक्तियों और पक्षकार मिलने की अतिरिक्त सुविधाएँ हैं। अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, अनुसूचित जातियों और महिलाओं की नियुक्तियाँ उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में दस प्रतिशत भी नहीं हो पाती। उच्चतम न्यायालय के लिए विख्यात विधिशास्त्रियों को भी संविधान के अनुसार योग्य माना गया है। न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह और संतोष हेगड़े जैसे चार वरिष्ठ वकीलों के अपवादों को छोड़कर केवल उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों से ही पदोन्नत करने की परम्परा बदस्तूर जारी है। क्या भारत में पिछले साठ वर्षों में योग्य विधिशास्त्री ही नहीं हुए? उपेन्द्र बख्शी एक शलाका पुरुष रहे हैं। सीरवई इतिहास पुरुष हो गए हैं। एस पी साठे, एम पी जैन और माधव मेनन जैसे कई विधिशास्त्री हैं। मुकदमे हैं कि आबादी, मच्छर और बेकारी की तरह बढ़ रहे हैं। रटे रटाए उत्तर आते हैं, ”न्यायाधीशों की कमी है। लोग आपस में लड़ते बहुत हैं। न्यायिक प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है। कमेटियां बन गई हैं। रिपोर्ट जल्द आ जाएगी। अगले सत्र में विधेयक लाया जा रहा है।” क्यों नहीं सुप्रीम कोर्ट के पास सभी वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते? सरकारें यह क्यों नहीं बता सकतीं कि न्यायपालिका की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कुल कितने संसाधनों की जरूरत है? इन्हें पूरा करने में सरकारों को क्या कठिनाइयाँ हैं? न्यायपालिका को उन अवधारणाओं और मिथकों को भी तोडऩा होगा जो ब्रिटिश व्यवस्था ने दी हैं। यह अवधारणा कि लोकसेवक ने अमूमन कानूनसम्मत आचरण ही किया होगा अथवा उनके निर्णय सद्भावनाजन्य ही होंगे-अब इतिहास की बातें हैं। अब तो ऐसे बहुसंख्यक नौकरशाह हैं जो जनसेवा के बदले अपना घर भरने की कला में प्रवीण हैं।

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