नेताओं के कुकर्म उजागर करें

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कनक तिवारी
9425220737
क्रमांक-7

म्हूरियत को गोपनीयता से गहरा परहेज होता है। यह जुमला न्यायपालिका पर भी चस्पा होता है। अपवाद की स्थितियां भी होती हैं, जब ऐसा करना जनहित अथवा संस्था की विष्वसनीयता को बनाए रखने के लिए आवष्यक हो। महान कानूनवेत्ताओं के अनुसार पारदर्शिता न्यायपालिका का गुण और लक्षण है। गोपनीयता उसका आपद् धर्म। जस्टिस कृष्ण अय्यर के अनुसार खुले समाज में अदालतों के लिए कोई साउंड प्रूफ व्यवस्था नहीं हो सकती। अदालती मामलों को खुली किताब की तरह रखना चाहिए। यह सही है कि उन्हें अफवाहों और दुर्भावनाओं की मिसाइलों का लक्ष्य भी नहीं बनाया जा सकता। संविधान-न्यायालयों के आसमान में यह सवाल विक्रम के कंधे पर लदे बैताल की तरह चीख रहा है कि क्या संस्था की पवित्रता को सुरक्षित रखने के नाम पर न्यायाधीशों के दुराचरण पर भी परदा डाल दिया जाये? संस्थाएं व्यक्तियों का समुच्चय होती हैं। एक मछली तालाब को गंदा कर सकती है। राजनीतिक दादाओं को यह मुगालता हो गया है कि वे कानून के परे हैं। न्यायपालिका को बताना पड़ता है कि कोई कितने ही ऊंचे पद पर क्यों न हो, कानून उसके भी ऊपर है। राजनेताओं को इस भ्रम और सुरक्षा का अहसास होता रहता है कि कार्यपालिका के तहत कार्य करने वाली जांच एजेंसियां अपने नियोक्ताओं के खिलाफ जांच नहीं कर सकतीं। यह न्यायपालिका है जिसने यथार्थ से उनका साक्षात्कार कराया और जांच एजेंसियों को सीधे निर्देष दिए कि वे अपने राजनीतिक आकाओं के इंद्रधनुषी भ्रष्टाचार की जांच करें।
कौन नहीं जानता कि विधायिकाओं के कई सदस्य बेहद भ्रष्ट, पाखंडी और जनविरोधी भी होते हैं। इनमें से अनेक घोषित या संदिग्ध अपराधी भी हैं। यह कोई नहीं कह सकता-न्यायाधीश भी नहीं-कि ऐसे कुटिल राजनीतिज्ञों की कलई कानून की प्रक्रिया के अनुसार नहीं खुलनी चाहिए। यह भी कि समाज के चैथे स्तंभ प्रेस को इनका भांडा नहीं फोडऩा चाहिए। दार्शनिक तर्क तो यही है कि जनता को सच की जानकारी होने से कोई भी सरकार, सिद्धांत या श्रेष्ठि वर्ग नहीं रोक सकता। मंत्रिगण यह नहीं कह सकते कि कार्यपालिका की सर्वोच्च सत्ता की जांच नहीं की जा सकती क्योंकि उससे कथित रूप से कैबिनेट की हेठी होती है। आरोपी या अपराधी न्यायाधीश भी नहीं कह सकते कि उनके निजी व्यवहार के अंधेरे कोने रोशनी से परहेज करते हैं क्योंकि न्याय मंदिर की अपवित्रता की कहानियां घर घर सुनी कही जायेंगी। सत्य के तेजाब में जब बहुमूल्य धातु घुलती है, तब ही गंदगी ही उसका साथ छोड़ती है। आलोचना से बचने की न्यायपालिका की हर कोशिश उसकी नैतिक जड़ों को कमजोर करती है। ऐसी सूरत में न्यायपालिका हारते हुए युद्ध में अवमानना का डंडा लिए हर अहिंसक व्यक्ति को धमकाती भले रहे। ‘सत्यमेव जयते’ संविधान का मकसद और उद्देष्य है। वह ‘हम भारत के लोग’ की सार्वभौमिकता की सुगंध है। न्यायपालिका का सच भारत के अस्तित्व का भी सच है। पीढिय़ों को इस बात का संवैधानिक, जातीय और काल सापेक्ष अधिकार है कि वे संविधान न्यायालयों की असलियत को केवल मगरमच्छ की पीठ पर चढ़े कड़े चमड़े की तरह समझने को मजबूर नहीं रहें, बल्कि उसे उलट पलट भी सकें।

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