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कनक तिवारी
9425220737
क्रमांक-7

न्यायाधीश की कार्यक्षमता का आकलन समकालीनता के प्रति उसकी समझ और जानकारी से भी जुड़ा होता है। समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, दर्शन, इतिहास, भूगोल और विज्ञान तथा साहित्य वगैरह के संचित ज्ञान और नई खोजों की व्यावहारिक और मोटी मोटी जानकारी भी न्यायाधीशों को होनी चाहिए। अन्यथा उनसे समाजमूलक न्याय निर्णयों की उम्मीद कैसे की जा सकेगी। कानून अपनी बुनियादी रचना में केवल तर्कशास्त्र के बड़बोलेपन का व्यावहारिक विस्तार नहीं है। समुद्र जल खारा है। उसमें ज्ञान-विज्ञान की हर दिशा से आती मीठे पानी के तेवरों की नदियां समाहित होती हैं। समुद्र नदी के जल के चरित्र से असंपृक्त नहीं होता। कानून के पाठ्यक्रमों में इस फैलाव, मकसद और प्रयोगों को लेकर कुछ नए विष्वविद्यालय जागरूक हैं। पिछले दशकों में पली बढ़ी न्यायपालिका के बुजुर्ग अधिवक्ता वर्ग भी इस ऐतिहासिक बदलाव के प्रति बेखबर हंै। न्यायाधीशों के सांस्कृतिक और कलात्मक बोध को लेकर कभी कभार ही कुछ दिखाई देता है। कुछ न्याय निर्णय शलाका पुरुषों को भी उद्धृत करते नजर आते हैं। मसलन विवेकानंद, टैगोर, गांधी, नेहरू, अम्बेडकर जैसे भारतीय प्रज्ञा पुरुष तो कभी अरस्तू, प्लेटो, शेक्सपियर, मिल्टन, वाल्टेयर, टॉलस्टॉय जैसे पश्चिम के अलग अलग धु्रवपुरुष। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश महर्षि महेश योगी और आचार्य रजनीश तक से प्रभावित दिखाई सुनाई पड़े हैं। हालिया वर्षों में अप्रतिम सामाजिक चिंतन हुआ है। उसके अमर हस्ताक्षरों नॉम चॉम्स्की, हटिंग्टन, एडवर्ड सईद, ग्राम्स्की और जैक देरिदा आदि से उनका अपरिचय लगता है। इक्कीसवीं सदी की चुनौतियां, विवशताएं और महत्वाकांक्षाएं संवैधानिक सोच के दायरे को भी विकसित कर सकती हैं। समूचे न्यायशास्त्र का दोहरा उद्देष्य केवल पक्षकारों के मुकदमे निपटाने तथा बार बार पारम्परिक भारतीय वैचारिकता की व्याख्याओं का संकल्प करने तक सीमित रहेगा तो वह संविधान का भविष्यमूलक हेतु नहीं बन पाएगा। विष्व बाजारवाद से अलग हटकर यदि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ हमारी सांस्कृतिक परंपरा का शाश्वत ऐलान है, तो समकालीन विश्व-चिंतन के रसायन की एक बूंद भारतीय विधिशास्त्र के कड़ाहों में नया खमीर उठाने के लिए क्यों नहीं डाली जा सकती। उससे वैचारिक समकालीनता रेखांकित की जा सकेगी। न्यायालयों में जाने पर किसी भी समकालीन चिंतक को एच.जी. वेल्स की टाइम मशीन में बैठकर 1984 की तरह पीछे जाने का बोध महसूस होने लगता है। ऊंची अदालतों की अंग्रेजी भाषा उन्नीसवीं सदी के अंगरेजी गद्य का पुनर्पाठ है। मैकाले, स्टीफन, टॉमस हार्डी, ऑस्कर वाइल्ड, मैथ्यू आर्नल्ड, राबर्ट ब्राउनिंग, टेनिसन आदि की भाषा भारतीय न्यायपालिका की समकालीन भाषा है। यदि भारतेन्दु हरिश्चंद्र, हरिऔध, बालकृष्ण भट्ट, श्रीधर पाठक, शिवपूजन सहाय, बाबू गुलाबराय, जगन्मोहन सिंह आदि की भाषा के साथ चलने से इक्कीसवीं सदी का हिन्दी गद्य इंकार कर चुका है, तो उन्नीसवीं सदी का अंगरेजी गद्य इक्कीसवीं सदी की भारतीय पेचीदगियों को सुलझाने के लिए न्यायालयों में रूढ़ होकर अब भी उकड़ूं क्यों बैठा है?
न्यायपालिका को सरहदें लांघते कार्यपालिका और विधायिका के क्रियाकलापों तक में हस्तक्षेप करते भी देखा गया है। न्यायपालिका ने संवैधानिक असंतुलन की कई नजीरें भी प्रस्तुत की हैं। न्यायपालिका जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि संस्था नहीं है। यह जानना दिलचस्प है कि जापान में प्रत्येक नौ वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को अपनी योग्यता के संबंध में मतदाताओं का विष्वास मत प्राप्त करना होता है। न्यायपालिका को यही दायित्व मिला है कि वह देखे कि कोई संस्था अपने अधिकारों का अतिक्रमण तो नहीं कर रही है। उससे भी इस आत्मानुशासन की उम्मीद की जाती है। यदि न्यायपालिका में ही तानाशाही या निरंकुशता के तेवर झिलमिलाने लगें, तब तो वह संविधान की सबसे बड़ी विवशता हो जाती है। न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका अथवा विधायिका के काम का बोझ उठा लेने से उन दोनों संस्थाओं को यह सुविधा भी मिल जाती है कि वे अपने जनतांत्रिक कर्तव्यों के प्रति ढीठ, उदासीन और लापरवाह हो जायें। न्यायपालिका से यह भी लोकतांत्रिक अपेक्षा होती है कि वह राजनीतिक विवादों या पचड़े में नहीं पड़े। उसका मुख्य काम प्रकरणों के निराकरण करने के साथ साथ कानूनों की सार्थकता, कार्यपालिका की नीयत और न्यायदान पद्धति की नई नई कानूनी संभावनाएं खोजना भी है। ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ जैसी कहावत का भी न्याय पद्धति से लेना देना होता जा रहा है। कई विशेषज्ञों ने एक बहुप्रचारित अवधारणा रची है कि न्यायाधीश जनता की जांच से परे होता है। यह मध्ययुगीन सामंतवादी सोच है। एक सार्वभौम गणराज्य की सार्वभौमिकता जनता में है। संसद, विधानसभाएं, न्यायपालिका और खुद संविधान सार्वभौम नहीं हैं। ऐसे आदर्श गणराज्य में न्यायपालिका और कार्यपालिका को क्रमश: राहु और केतु की भूमिका में धड़ और सिरविहीन नहीं समझा जा सकता। न्यायपालिका धरती की जड़ों के बगैर रंग और गंधहीन आकाशकुसुम नहीं है। उसकी प्रयोजनीयता, प्रतिबद्धता और प्रसरणशीलता जनता के प्रति दिखाई नहीं पडऩे से उसकी संस्थागत उपादेयता मृगतृष्णा की तरह हो जाती है। प्रसिद्ध न्यायाधीश जेरोम फ्रैंक ने अपनी क्लासिक कृति ‘कोट्र्स ऑन ट्रायल’ में कहा है-”एक प्रजातंत्र में लोगों को शासन के किसी भी पक्ष की कार्यकारिता से परिचित कराना गैर बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं कहा जा सकता। उस जनता को शिशु समझना गैरलोकतांत्रिक है, जो मनुष्य द्वारा रचित संस्थाओं की कमियों को स्वीकार करने से इंकार करती है। हमारी न्याय व्यवस्था की कमियाँ दूर की जा सकती हैं। सबसे अच्छा होगा कि सभी नागरिकों को यह सूचित कर दिया जाये कि वह प्रणाली किस तरह काम करती है। न्यायपालिका के प्रति जनधारणा को अज्ञान के आधार पर स्थापित करना एक ऐतिहासिक भूल होगी।

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