अनुच्छेद 32 की असली ताकत जनता के लिए!

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क्रमांक-5
कनक तिवारी
9425220737

अनुच्छेद 32 एक ऐसा दुर्लभ प्रावधान है जो सुप्रीम कोर्ट के कर्तव्य बोध की कुंजी है। अनुच्छेद 32 शतरंज के खेल का वह वजीर है जो शासक जनता के बचाव और अन्यायी पर आक्रमण की दोनों मुद्राओं में पारंगत है। न्यायाधीश का अधिकार नहीं है कि वह पंथनिरपेक्ष सामाजिक न्याय करने से बचे। इसके बाद भी हालत यही है कि कई फैसलों में सुप्रीम कोर्ट तक इशारे करता रहा है कि देश को वैश्वीकरण की जरूरत है। उसे विकसित बाजारवाद चाहिए। इसलिए संविधान की पंथनिरपेक्ष समाजवादी आयतों को ईद का त्यौहार मनाने की इजाजत देने के पहले उसको मोहर्रम पर्व मनाने के नाम पर उसकी खुशियों की छुट्टी की जा रही है। यह शब्द छल है या छल के शब्द हैं-इतिहास तय करेगा। अनुच्छेद 32 न्यायाधीशों तक के लिए पूरी तौर पर आदेशात्मक है। उसमें न्यायाधीशों के निजी विवेक की गुंजाइश नहीं है। उसकी आड़ में इस अनुच्छेद की संभावनाओं को सीमित नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट देश के इतिहास और भूगोल की अंतिम अदालत जरूर है। फिर भी वह देश का पाथेय नहीं है। यही वजह है कि संवैधानिक अधिकारों के हनन के प्रकरणों में किसी भी देशवासी को उच्च न्यायालय में दस्तक दिए बगैर सीधे उच्चतम न्यायालय जाने की नैसर्गिक पात्रता है। अनुच्छेद 32 संविधान की सबसे जीवंत घोषणा है। डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा में जब अनुच्छेद 32 को लेकर यह मर्मस्पर्शी बयान दिया था कि यदि कोई उनसे पूछे कि संविधान का वह कौन सा अनुच्छेद है जिसके बिना संविधान ही एक नकारात्मक घटित है तो वे साफ कहेंगे कि यह अनुच्छेद 32 ही है। यह अनुच्छेद अपने सांस्कारिक संदर्भ में विक्रमादित्य की सिंहासनबत्तीसी की याद भले दिलाता हो, लेकिन इस अनुच्छेद की दुर्गति विष्व व्यापारिक बाजारवाद के ताजा दबावों के चलते हुई है। उससे अम्बेडकर का सपना खण्ड खण्ड होकर टूट गया है। संवैधानिक उपचार की यह रीढ़ की हड्डी कोई प्रक्रिया मात्र नहीं है। वह खुद एक मूल अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट संविधान की परिधि के भीतर रहकर अपनी व्याख्या में समर्थ और अनंत हैं। वे भारत के हर निवासी बल्कि वस्तु तक के लिए गुरुत्वाकर्षण नियम की तरह हैं। वे पृथ्वी की सत्ता के बाहर वहां तक उछल पाते हैं-जहां तक नियम अनुमति देते हैं। न्यायपालिका के कुछ फैसले लेकिन इस सिद्धांत की हेठी करते भी प्रतीत होते हैं। कभी कभी वे समाजवाद को सरकार और समाज के दाम्पत्य की छोड़छुट्टी का समानार्थी बनाते हैं। यह महत्वपूर्ण निकर्ष है कि अनुच्छेद 32 के तहत दिए गए सुप्रीम कोर्ट के न्याय निर्णय संविधान के ढांचे की व्याख्या करते हैं। ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के कई न्यायाधीश इस तथ्य से बेखबर या बाखबर रहते हुए संविधान के घोषित उद्देश्यों को लेकर ऐसे भी फैसले करते नजर आते हैं जिनके लचीलेपन के कारण संविधान का मकसद पूंजीवाद की ओर झुकता नजर आता है। कार्यपालिका सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों को जिबह करने के लिए विनिवेश मंत्रालय स्थापित कर दे। न्यायपालिका ऐसे निर्णयों पर मुकम्मिल संवैधानिकता की मोहर भी लगाती चले। तब संविधान के जनवादी उद्देश्य उस मछली की तरह तड़पने लगते हैं जिसे मारने के लिए इतना बड़ा जाल डाला गया हो कि पूरा तालाब ही सूख जाए। क्या यह मछली के विवेक पर छोड़ा जाए कि वह जलरहित जीवन के कारण अपनी हत्या और आत्महत्या में से किसे चुनना चाहती है? यह भारत है जहां विधायिका और कार्यपालिका ने अपने संवैधानिक अकर्म के बावजूद न्यायपालिका को अप्रत्यक्ष इशारों में इतना विवश कर दिया है कि वह संविधान के घोषित उद्देश्यों की व्याख्या की अपनी थ्योरी में व्यापारिक बाजारवाद की तेज पछुआ हवा से प्रभावित होती दिखे। इसलिए इसके तहत किए गए ऐलान पूरे देश पर उसके यथार्थ के अतिरिक्त उसकी संभावनाओं के फलक बनकर भी लागू होते रहते हैं। संविधान के जीवित उद्देश्यों में संशोधन भले नहीं हों, सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों की रोशनी में विधायिका और कार्यपालिका अपने अकर्म में रत रहकर संविधान की हेठी करती रहती हैं। तब भी संविधान क्या टुकुर टुकुर देखते रहने के लिए ही अभिशप्त है? बाल्को के निजीकरण के प्रकरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के उद्देष्यों के बरक्स कार्यपालिका को इतना महत्वपूर्ण बना दिया कि अनुच्छेद 32 को अपनी भविष्य की व्याख्याओं के लिए सही पुनर्विचार की जरूरत होगी क्योंकि यही अनुच्छेद व्यापक जनआकांक्षाओं का संकेत सूत्र है।

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