सुप्रीम कोर्ट के लिए क्या है संविधान का आदेश?

Sharing it

कनक तिवारी
9425220737

क्रमांक-4

संविधान में उच्चतम न्यायालय की स्थापना तथा अधिकारों को लेकर निम्नलिखित अनुच्छेद महत्वपूर्ण हैं:-
”124. उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन-(1) भारत का एक उच्चतम न्यायालय होगा जो भारत के मुख्य न्यायमूर्ति और, जब तक संसद् विधि द्वारा अधिक संख्या विहित नहीं करती है तब तक, सात से अनधिक अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेेगा।
(2) उच्चतम न्यायालय के और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के प्रश्चात, जिनसे राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिए परामर्श करना आवश्यक समझे, राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश को नियुक्त करेगा और वह न्यायाधीश तब तक पद धारण करेगा जब तक वह पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेता है:
परंतु मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न किसी न्यायाधीश की नियुक्ति की दशा में भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से सदैव परामर्श किया जाएगा: परन्तु यह और कि- (क) कोई न्यायाधीश, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा, (ख) किसी न्यायाधीश को खण्ड (4) में उपबंधित रीति से उसके पद से हटाया जा सकेगा। 6 (2-क) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की आयु ऐसे प्राधिकारी द्वारा ऐसी रीति से अवधारित की जाएगी जिसका संसद् विधि द्वारा उपबंध करे। 8 (3) कोई व्यक्ति, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब तक वह भारत का नागरिक है और- (क) किसी उच्च न्यायालय का या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम पांच वर्ष तक न्यायाधीश रहा है; या (ख) किसी उच्च न्यायालय का या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम दस वर्ष तक अधिवक्ता रहा है; या (ग) राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता है।” ”130. उच्चतम न्यायालय का स्थान-उच्चतम न्यायालय दिल्ली में अथवा ऐसे अन्य स्थान या स्थानों में अधिविष्ट होगा जिन्हें भारत का मुख्य न्यायमूर्ति, राष्ट्रपति के अनुमोदन से समय-समय पर, नियत करे।” ”131. उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता-इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए- (क)भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच, या (ख) एक ओर भारत सरकार और किसी राज्य या राज्यों और दूसरी ओर एक या अधिक अन्य राज्यों के बीच, या (ग) दो या अधिक राज्यों के बीच, किसी विवाद में, यदि और जहां तक उस विवाद में (विधि का या तथ्य का) ऐसा कोई प्रश्न अंतर्वलित है जिस पर किसी विधिक अधिकार का अस्तित्व या विस्तार निर्भर है तो और वहां तक अन्य न्यायालयों का अपर्वजन करके उच्चतम न्यायालय को आरंभिक अधिकारिता होगी: 6 परन्तु उक्त अधिकारिता का विस्तार उस विवाद पर नहीं होगा जो किसी ऐसी संधि, करार, प्रसंविदा, वचनबंध, सनद या वैसी ही अन्य लिखत से उत्पन्न हुआ है जो इस संविधान के प्रारम्भ से पहले की गई थी या निष्पादित की गई थी और ऐसे प्रारम्भ के पष्चात् प्रवर्तन में है या जो यह उपबंध करती है कि उक्त अधिकारिता का विस्तार ऐसे विवाद पर नहीं होगा। 8” ”139. कुछ रिट निकालने की शक्तियों का उच्चतम न्यायालय को प्रदत्त किया जाना-संसद् विधि द्वारा उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 32 के खण्ड (2) में वर्णित प्रयोजनों से भिन्न किन्हीं प्रयोजनों के लिए ऐसे निदेश, आदेश या रिट, जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिशेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेरण रिट हैं, या उनमें से कोई निकालने की शक्ति प्रदान कर सकेगी।” ”140. उच्चतम न्यायालय की आनुशंगिक शक्तियां-संसद्, विधि द्वारा, उच्चतम न्यायालय को ऐसी अनुपूरक शक्तियां प्रदान करने के लिए उपबंध कर सकेगी जो इस संविधान के उपबंधों में से किसी से असंगत न हों और जो उस न्यायालय को इस संविधान द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त अधिकारिता का अधिक प्रभावी रूप से प्रयोग करने के योग्य बनाने के लिए आवश्यक या वांछनीय प्रतीत हों।”
”141. उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि का सभी न्यायालयों पर आबद्धकर होना-उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर होगी।” ”142.उच्चतम न्यायालय की डिक्रियों और आदेशों का प्रवर्तन और प्रकटीकरण आदि के बारे में आदेश-(1) उच्चतम न्यायालय अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसी डिक्री पारित कर सकेगा या ऐसा आदेश कर सकेगा जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक हो और इस प्रकार पारित डिक्री या किया गया आदेश भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र ऐसी रीति से, जो संसद् द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन विहित की जाए, और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक, ऐसी रीति से जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा विहित करे, प्रवर्तनीय होगा। (2) संसद् द्वारा इस निमित्त बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए उच्चतम न्यायालय को भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र के बारे में किसी व्यक्ति को हाजिर कराने के, किन्हीं दस्तावेजों के प्रकटीकरण या पेश कराने के अथवा अपने किसी अवमान का अन्वेशण करने या दण्ड देने के प्रयोजन के लिए कोई आदेश करने की समस्त और प्रत्येक शक्ति होगी।” ”143. उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति-(1) यदि किसी समय राष्ट्रपति को प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की संभावना है, जो ऐसी प्रकृति का और ऐसे व्यापक महत्व का है कि उस पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना समीचीन है, तो वह उस प्रश्न को विचार करने के लिए उस न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा और वह न्यायालय, ऐसी सुनवाई के पश्चात् जो वह ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय प्रतिवेदित कर सकेगा। (2) राष्ट्रपति अनुच्छेद 131 खÓÓÓ, के परन्तुक में किसी बात के होते हुए भी, इस प्रकार के विवाद को, जो 6उक्त परन्तुक8 में वर्णित है, राय देने के लिए उच्चतम न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा और उच्चतम न्यायालय, ऐसी सुनवाई के पश्चात् जो वह ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय प्रतिवेदित करेगा।” भारतीय संविधान की उद्देशिका में सार्वभौमिकता, समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र की घोषणाएं हैं। इसके बावजूद ऊंची अदालतों में ऐसे जजों की नियुक्ति होती गई है जिनका समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे सिद्धांतों में घोषित और स्वीकृत विश्वास नहीं रहा है। सर्वोच्च संवैधानिक पीठ पर बैठकर जब देश के आर्थिक परिदृश्य को लेकर कानूनों पर विचार किया जाता है, तब ही न्यायाधीशों की वैचारिक पृष्ठभूमि का खुलासा होता है। संविधान और न्याय व्यवस्था में अमेरिकी और ब्रिटिश प्रणाली की गंध है। वह उस व्यक्ति तक की समझ में आता है जिसे समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को लेकर नजला भी हुआ हो। भारतीय संविधान जड़, स्थिर या ठहरा हुआ सिद्धांत नहीं है। उसका विश्व संदर्भ भी है। वह पृथ्वी की तरह अपनी धुरी पर तो घूमता ही है, साथ ही ज्ञान के सूर्य की दैनिक परिक्रमा भी करता है। यदि दुनिया के अन्य देशों के संविधान तेज गति से चल, बदल या संशोधित हो रहे हों, तो भारतीय संविधान ऐसे संदर्भों और तुलनाओं से अछूता भी नहीं रह सकता। जरूरत है उन जनवादी आस्थाओं, मान्यताओं और परिकल्पनाओं से संविधान को संपृक्त करने की, जिन्होंने भारतीय आजादी के आंदोलन में अंगरेजी राज ही नहीं, उसकी दृष्टि और विचार से भी लोहा लिया था। संविधान आजादी के ठीक बाद उपस्थित होकर कई बार जनता और सरकार के मैच के ड्रा होने की सीटी बजाता हुआ अम्पायर या रेफरी नजर आता है। संविधान के सामाजिक आडिट की भी बुनियादी जरूरत है। समाजवादी समाज का उद्देष्य है कि वह आर्थिक आमदनी और जीवन स्तर की सभी विसंगतियों को दूर करे। बचपन के पालने से लेकर अर्थी तक की यात्रा में निरीह मनुष्य को भी सम्मानजनक जीवन जीने का हौसला देना पंथनिरपेक्षता और समाजवाद के कारण है।
(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं यह लेखक के अपने विचार हैं) (क्रमश:)

Sharing it

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *