आप भी कटघरे में हैं माइलॉर्ड?

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कनक तिवारी
क्रमांक-3
न्यायाधीश को सम्प्रदायवाद, क्षेत्रीयतावाद और मतवाद से परे होना चाहिए। उन्हें मंत्रियों का पिछलग्गू और राजनीतिक नेताओं का अनुयायी या हमदर्द दीखने पर वह सम्मान नहीं मिल सकता जिसके वे अन्यथा हकदार हैं। कई बार दिखाई देता है कि बड़ी सरकारी कुर्सियों पर निगाह रखने वाले न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के बाद के ऐसे संभावित पदों के लिए अपनी जन्मकुंडली साथ लिए फिरते हैं। निष्प्क्षता, तटस्थता और स्थितप्रज्ञता की डींग हांकने वाले न्यायाधीश राष्ट्रपति पद से लेकर सांसदों तक के चुनाव में अलग अलग पार्टियों के उम्मीदवार बनते देखे गये हैं। यदि उनकी किसी से राजनीतिक समझ की पहले से ही सांठगांठ नहीं रही होगी तो उन्हें कोई पार्टी क्यों कर टिकट देना चाहेगी? कई जज अपनी सुरक्षित कुर्सी पर बैठे अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते रहते हैं। वह स्वयं की अवमानना की तरह आचरण करते हंै। उनमें अधिवक्ताओं और पक्षकारों के प्रति एक तरह का कुंठित दर्प चोटिल सांप की तरह फुफकारता रहता है। न्याय करने तथा कानून की चुनौतीपूर्ण व्यवस्था से जूझने के बदले ऐसे न्यायाधीश वकील का उपहास उड़ाने में आत्मसंतोष प्राप्त करते बदजुबानी और बदखयाली से इस उज्जवल संस्था के इतिहास और भविष्य को कलंकित करते रहते हैं। कई न्यायाधीशों को सांप्रदायिक, पक्षपाती और खुल्लमखुल्ला भ्रष्ट होने का सामाजिक प्रमाण पत्र मिलता रहता है। उनके निकट संबंधी सहसा समाज में महत्वपूर्ण हो उठते हैं। ऐसे न्यायाधीश न्याय प्रक्रिया पर बदनुमा दाग की तरह होते हैं। डेविड पैनिक ने कहा है ‘न्यायपालिका का विद्यार्थी यह मुकम्मिल तौर पर जानता है कि सदियों से बुरे और वितृष्णा उत्पन्न करने वाले न्यायाधीश हुए हैं। उनमें तरह तरह के दोष रहे हैं।’ विख्यात अंगरेज दार्शनिक, लेखक और न्यायाधीश फ्रांसिस बेकन के अनुसार न्याय का स्थान पवित्र होता है। इसलिए वह पूरा परिसर किसी भी तरह के भ्रष्टाचार तथा कलंक से मुक्त रहना चाहिए। कई न्यायाधीश कायर और मौकापरस्त होते हैं। राजनीतिक महारथियों और व्यापारिक दिग्गजों के प्रकरणों में उनकी कलम की स्याही उनकी नहीं और किसी की रची भाषा लिखती है। सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के मुकदमे छुट्टियों के दिन और वह भी न्यायाधीश के बंगले पर कैसे सुने जा सकते हैं। भोपाल गैस त्रासदी के मुकदमों को लेकर कुछ फैसलों की न्यायिक क्षेत्रों में तीखी आलोचना हुई थी।
अमेरिका में न्यायाधीशों के आचरण का परीक्षण करने के सुस्थापित कानून और प्रक्रियाएं हैं। ऐसे प्रकरणों में तरह तरह के पूर्वोदाहरण और संशोधन उपलब्ध हैं। भारत में स्थिति ऐसी नहीं है। समय समय पर संसद ने सक्षम कानून बनाने के संबंध में विचार भी किया होगा, लेकिन अब तक वही ढाक के तीन पात हैं। संविधान समीक्षा आयोग ने भी अपनी रपट में इस मुद्दे पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उसने राष्ट्रीय न्यायिक आयोग गठित करने की सिफारिश की है। न्यायाधीशों के जांच अधिनियम को भी बदल डालने की पुरजोर वकालत की है। न्यायाधीश का चोगा कोई बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं है जिसे आरोपों की गोली भेद न सके। भारतीय संविधान में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बहुत सुरक्षित हैं। निलंबन, स्थानांतरण, विभागीय जांच, सेवाच्युति जैसे शब्दों का वे अन्य सेवाओं के लिए अपने निर्णयों की मीमांसा में उल्लेख करते रहते हैं। ये बेचारे शब्द खुद उनके सामने गिड़गिड़ाने लगते हैं। उनकी सेवा शर्तें लोहे के रक्षा कवच की तरह हैं। उनकी आलोचना करना तक खतरे से खाली नहीं है। इसमें शक नहीं कि बहुत से न्यायाधीश अब भी आदर्श मानदंडों पर खरे उतरते हैं। यदि तालाब में बहुत सी मछलियां बढ़ते कीचड़ का कारण हों तो साफ सुथरे व्यक्तित्व भी अपनी संस्थागत सोहबत के कारण आलोचना के जाल में चरित्र की ओशजन के लिए फडफ़ड़ाते रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के बुनियादी सिद्धांतों में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को अंगीकार किया गया है। यह भी अपेक्षा की गई है ‘न्यायाधीश इस तरह आचरण करेंगे जिससे वे अपने पद की गरिमा और निष्पक्षता तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कायम रख सकें।’इन बुनियादी सिद्धांतों के अनुच्छेद आठ में न्यायपालिका की स्वतंत्रता वर्णित है। अनुच्छेद सत्रह के अनुसार यदि न्यायाधीश के विरुद्ध कोई आरोप या शिकायत दर्ज होती है तो उसे जल्दी से जल्दी सुविचारित प्रक्रिया के तहत निपटाने का प्रावधान है। इसके अनुसार संबंधित न्यायाधीश को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिया जाएगा तथा जरूरत के अनुसार पूरी जांच कार्यवाही को गोपनीय भी रखा जाएगा। पद की गरिमा के अनुसार जांच भी सम्मानजनक प्रक्रिया के अनुसार की जाएगी। विन्स्टन चर्चिल ने तो न्यायाधीशों के डर्बी लॉटरी जीतने तक को दुराचरण की परिभाषा के तहत माना था।
(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं यह लेखक के अपने विचार हैं)
(क्रमश:)

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