क्या न्यायाधीश आलोचना के परे हैं?

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कनक तिवारी- क्रमांक-2
मशहूर विचारक हेरॉल्ड जे. लास्की के अनुसार न्यायाधीशों की जिस तरह नियुक्ति होती है, जिस तरह वे न्याय करते हैं, जिस तरह वे न्याय पीठ पर जमे रहते हैं-ऐसे सभी सवाल राजनीतिक दर्शनशास्त्र के जेहन से उद्भूत होते हैं। जिस तरह कोई देश न्याय करता है , उससे यह साफ नजऱ आता है कि उसका चारित्रिक स्तर कैसा है। भले ही वह अन्य प्रशासनिक विभागों में छद्म कर रहा हो। प्रशासनिक निर्णयों का भूत, भविष्य और वर्तमान न्यायपालिका के हत्थे चढ़ता है। लोग हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट अर्थात संविधान न्यायालयों में लोकतंत्र के प्रतिमान ढूंढऩा चाहते हैं। वे यह भी चाहते हैं कि इन संस्थाओं की भी जिम्मेदारी और जवाबदेही जनता के प्रति हो, सरकार या अन्य प्रतिष्ठान के प्रति नहीं। लोग यह भी जानना चाहते हैं कि हमारे संविधान न्यायालयों में अंतत: हो क्या रहा है? न्यायाधीश किस तरह नियुक्त हो रहे हैं? न्यायालयों का प्रशासनिक और वित्तीय नियंत्रण किनके हाथों में है? न्यायाधीशों की सेवा शर्तें कैसी हैं? न्यायालय की अवमानना का क्या अर्थ है और खुद किस तरह न्यायाधीशों को अनुशासन की मर्यादा में रखा जा सकता है? लोग जानना चाहते हैं कि उनके प्रति जवाबदेह न्यायालयों में जनता का दुख क्यों बढ़ता जा रहा है? जनता को ‘न्याय’ देने के बदले मामले के ‘निपटारे’ का रुक्का क्यों पकड़ाया जा रहा है? काले कोट और काले गाउन की अधिवक्ता-न्यायाधीश जुगलबन्दी का चरित्र संदिग्ध या प्रष्नवाचक नहीं है। वह समाज को रचने की बुनियादी भूमिका से काफी कुछ विचलित ज़रूर होता दिखता रहता है। न्यायालयों में करोड़ों मुकदमों का अंबार लगा है। न्यायपालिका अपनी कभी कभार की छटपटाहट के बावजूद कुछ सार्थक नहीं कर पा रही है। दोष केवल न्यायपालिका का नहीं है। कार्यपालिका द्वारा पर्याप्त/स्वीकृत संख्या में न्यायाधीश नियुक्त ही नहीं किए जा रहे हैं। न्यायाधीशों की जिद के कारण उनकी सेवा शर्तों में सुधार करने में ही वर्षों लग रहे हैं। प्रणाली अब भी अविकसित है। सरकारों के उत्तरदायित्व भी मुंह चुरा रहे हैं। जनता को ऐसा भी लगता है कि सत्ता प्रतिष्ठान चाहता ही है कि लोग मुकदमों के संस्कृति-कर्म में उलझे रहें। यह कैसी उत्सवधर्मिता है कि लाखों लोग कचहरियों के प्रांगण में प्रतिदिन डेरा डंडा डाले पड़े रहते हैं? इससे बहुत सा जनविरोध अपने आप गीली बारूद की तरह केवल फुसफुसा कर रह जाता है। वह सत्ताधीश ही क्या जो अपने लिए अट्टहास करने का मौलिक प्रयोग ईजाद नहीं कर पाये! कुछ न्यायाधीश भी कभी कभी दुष्कर्म अथवा अकर्म के चलते कार्यपालिका के सहयोगी संस्थान के रूप में जनता की नजर में दो चार होते हैं।
संविधान निर्माताओं ने ऊंची अदालतों का आकाश बुनने में दुनिया के कई संविधानों से प्रेरणास्पद उधार लिया है। उनकी कोशिश भी रही है कि अदालतों को सम्मान की गरिमा से लीपा जाये। इससे कार्यपालिका और विधायिका सहित आम जनता को भी महसूस हो कि यह बेहद महत्वपूर्ण संस्था लोकतंत्र के विकास के लिए स्थापित की गई है। संविधान निर्माताओं ने उच्च न्यायाधीशों की जवाबदेही का कोई समीकरण लेकिन नहीं लिखा। निष्पक्षता न्यायप्रियता का समास है। फिर भी न्यायाधीशों के लिए भ्रष्ट, बिकाऊ, दुराचारी और पक्षपाती जैसे बने बनाए लेबल दलाली के बाजार में सुनाई पड़ते हैं। विधायिका और कार्यपालिका के सर्वोच्च अधिकारियों तक के लिए भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाने पर दंड और जांच के नये से नये कानून संशोधित होते हुए गढ़े जाते हैं। सामान्य जांच से परे रखे जाने वाले न्यायाधीश जन-दृष्टि में स्थायी ‘मिस्टर क्लीन’ की भूमिका में समझे जाते हैं। जिन तार्किक हथियारों से न्यायाधीश किसी अन्य अधिकारियों को दोषी सिद्ध करते हैं, उन्हें अपने खिलाफ इस्तेमाल होने की संभावना को वे अन्याय के विद्द्ध की तरह क्यों समझते हैं? ऐसा नहीं है कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता को लेकर सब कुछ हरा ही हरा है और लोग सावन के अंधे हैं। तरह तरह के चरित्र के माइ लॉडर््स हैं। न्यायपालिका का रोम एक दिन में भले नहीं बना हो लेकिन वह अपने ऐतिहासिक भग्नावशेषों पर पलस्तर चढ़ाए बिना भरभरा कर गिर जाने के खतरों से भी बच नहीं सकता। ऊंची अदालतों की अपनी जिम्मेदारियों और लोप के लिए कोई संवैधानिक जवाबदेही कानून या जनता के प्रति नहीं है। कई न्यायाधीश न्यायिक कार्यों से अलग अपनी निजी जिं़दगी में सार्वजनिक तौर पर कदाचार, भ्रष्टाचार और यहां तक कि व्यभिचार का पोचारा फेरते रहते हैं और वह भी बेखौफ होकर। न्यायाधीशों की कोई निजी जिं़दगी इस अर्थ में नहीं हो सकती क्योंकि वह चैबीसों घंटे ही न्यायाधीश होते हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल ने कहा था कि न्यायाधीशों को जीवन और आचरण के मानदंडों पर सामान्य लोगों से अधिक खरा उतरना होता है। भय, पक्षपात, स्नेह और दुर्भावना से परे जाकर न्यायाधीश को अंतरात्मा की आवाज़ पर न्याय करना होता है। अंग्रेज़ी जुमले में उसे सीजऱ की पत्नी की तरह संदेह से परे रहना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं)
(क्रमश:)

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