मुंबई-दिल्ली में बैठकर नहीं बोल सकते- बस्तर ब्लैक होल है

Sharing it

  •  बुद्धिजीवियों का 11 सदस्यीय टीम ने तीन दिवसीय बस्तर दौरे से लौटकर किए कई खुलासे
    रायपुर, (नव प्रदेश)। मुंबई और दिल्ली में बैठकर जब कोई कहता है कि छत्तीसगढ़ में सिर्फ नक्सलिओं आंतक का गढ़ और महिलाओं का शारीरिक शोषण होता है, तब मन ग्लानी और दुख से भर उठता है। क्या यहीं छत्तीसगढ़ और विशेषकर बस्तर की पहचान है।
    अपनी यह अभिव्यक्ति प्रेस वार्ता के दौरान उन 11 सदस्यीय टीम ने व्यक्त की है, जिन्होंने सच्चाई जानने के लिए लगातार 3 दिनों तक बस्तर के गली-कूचे में घूम आए थे।
    नहीं है छत्तीसगढ़ का बस्तर ब्लैक होल
    दरअसल नक्सलवाद की समस्या से ग्रस्त देश-दुनिया के चैनल्स, समाचारपत्रों में छत्तीसगढ़ का इफैक्ट ऐरिया बस्तर को रेड कैपिटल और ब्लैक होल के रूप में पेश किया जा रहा था, उन परिस्थितियों में सच जानने के लिए दिल्ली जेएनयू व डीयू के प्राध्यापकों, फिल्ममेकर, वकील और विद्यार्थियों के 11 सदस्यीय दल ने बस्तर का तीन दिवसीय दौरा किया।
    दिल्ली से आए बुद्धिजीवियों में जेएनयू के प्राध्यापक डॉक्टर बुद्ध सिंह, यूडीएएएन के संस्थापक सुमित मालूजा, फिल्मकार सुदीप्तो सेन, डीयू की प्राध्यापक डॉक्टर प्रेरणा मल्होत्रा, सहायक प्राध्यापक डॉक्टर श्रुति मिश्रा, अधिवक्ता राघव अवस्थी, मोहित कुमार, मनोरंजन कुमार, डीयू के विद्यार्थी नकुल एवं आदित्य कुमार की इस टीम ने 15 गांवों के हालातों से रूबरू हुए, वहां के लोगों से बातचीत की, सरेंडर किए गए नक्सलियों से मिले। सब कुछ देखने-सुनने के बाद हालात जस्ट उलटा पाया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो टीवी चैनल्सों में कहा और दिखाया जाता है, वह सच नहीं है। चंद बाहरी आपराधिक गतिविधियों में लिप्त लोग ही छत्तीसगढ़ में कब्जा जमाए हुए है, और वहीं चंद लोग नहीं चाहते है कि यहां विकास हो।
    एजुकेशन हब में दंतेवाड़ा अद्भूत
    डीयू की प्राध्यापक डॉक्टर प्रेरणा मल्होत्रा ने कहा कि एजुकेशन हब के लिए दंतेवाड़ा में जो काम हमें देखने को मिला वह अद्भूत है। वहां का ऑडिटोरियम में 900 लोगों की बैठने की क्षमता है, जो अच्छे-अच्छे मेट्रो सिटी में भी उपलब्ध नहीं है। दूर रहकर यह कल्पना नहीं किया जा सकता है कि दंतेवाड़ा का रेसिडेंसियल स्कूल इतना शानदार हो सकता है। मूक बधिरों के लिए अत्यानुधिक उपकरण वहां देखने को मिलें। महिला सशक्तिकरण का भी अद्भूत काम वहां हुआ है। प्रोफेसर प्रेरणा ने कहा कि अक्सर यह बात होता है कि बस्तर में विकास क्यों नहीं हुआ? लेकिन वहां जाने के बाद हमने देखा व जाना कि 1980 के पहले की सड़क को नक्सलियों ने उड़ा दिया, उसे क्षति पहुंचाया गया। तो कौन है वह चंद लोग जो विकास नहीं चाह रहा है। इन सभी परिस्थितियों को शासन-प्रशासन से लेकर मीडिया, बुद्धिजीवियों को समझना होगा।
    टीम ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री भी किया मुलाकात
    छत्तीसगढ़ प्रवास पर पहुंचे इस दल ने जहां बस्तर आने से पहले राज्य के मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह से मुलाकात कर ली थी वही बस्तर से लौटकर दल के सदस्यों ने छत्तीसगढ़ के राज्यपाल बीडी टंडन से मुलाकात के बाद एक बार दोबारा मुख्यमंत्री से मुलाक़ात किया। इस अवसर पर दल ने अपने बस्तर दौरे का एक संक्षिप्त रिपोर्ट भी गवर्नर और सीएम को सौंपा। दल के सदस्यों ने जानकारी देते हुए बताया कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों से ही नक्सलवाद के समाधान को लेकर सार्थक चर्चा हुई है।
    डीजीपी और कल्लूरी से भी की मुलाक़ात
    दल के सदस्यों ने पुलिस मुख्यालय में डीजीपी एएन उपाध्याय से मिल कर बस्तर के हालात पर चर्चा की। इस अवसर पर एडीजी अशोक जुनेजा, आईजीपी एसआरपी कल्लूरी, एसपी आईके एलेसेला भी मौजूद थे। लगभग 2 घंटे तक चली इस बैठक में बस्तर से मिशन 2016 के बेहतर परिणाम से वाकिफ होकर लौट रहे बुद्धिजीवियों ने पुलिस अधिकारियों को सफलता की बधाई दी।
    जेएनयू समेत देश के 65 प्रोफेसर देशद्रोही: प्रो. बुद्ध सिंह
    जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के प्रो. बुद्ध सिंह ने बड़ा खुलासा किया है। प्रो. बुद्ध सिंह का दावा है कि उन्होंने सबूत सहित 65 प्रोफेसरों की लिस्ट बनाई है, जो देशद्रोही गतिविधियों में लिप्त हैं। इन 65 लोगों मेें जेएनयू समेत कई विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर्स शामिल हैं। इनके नामों का खुलासा भी मैं जल्द करूंगा। जेएनयू समेत कई विश्वविद्यालय ऐसी हैं, जहां के प्रोफेसर्स नक्सली विचारधारा का सपोर्ट करते हैं और नक्सलियों का कोई नुकसान होने पर शोक मनाते हैं। इनको अंतर्राष्ट्रीय पर ना केवल समर्थन मिलता है, बल्कि फंडिंग भी होती है।
    प्रो. बुद्ध सिंह ने बताया कि मेरे बस्तर प्रवास के दौरान मुझे सूचना मिली कि मुझे जेएनयू के शिक्षक कौंसिल से बाहर कर दिया गया है। चूंकि मैं बस्तर की वास्तविकता जानने आया था, और जेएनयू नहीं चाहता कि बस्तर या कश्मीर की वास्तविकता देश के सामने आए। जबकि जवानों के मरने पर जेएनयू के भीतर होली का त्यौहार मनाया जाता है। लेकिन जब हम शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं, तब जेएनयू में हम पर अटैक किया जाता है।
    जेएनयू में सक्रिय है आईआईएस
    जेएनयू में भारतीय आईआईएस सक्रिय है। कुछ लोग हैं, जो आर्थिक, बौद्धिक, सामाजिक रूप से आतंकवादियों को समर्थन देते हैं।

Sharing it

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *