कर्नाटक : कांग्रेस का लिंगायत कार्ड हुआ फेल, बीजेपी की ओर रहा समुदाय

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कर्नाटक : कांग्रेस का लिंगायत कार्ड हुआ फेल, बीजेपी की ओर रहा समुदाय

नई दिल्‍ली : कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी, कांग्रेस और जेडीएस के लिए चौंकाने वाले हैं. वजह है लिंगायत समुदाय. जी हां, कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार ने चुनाव से पहले लिंगायत कार्ड खेलते हुए प्रदेश में इस समुदाय को अल्‍पसंख्‍यक का दर्जा देने के लिए प्रस्‍ताव पारित किया था. कांग्रेस के इस दांव से सियासी गलियारों में माना जा रहा था कि लिंगायत समुदाय कांग्रेस की ओर बढ़ चलेगा और चुनावों में उसे ही वोट देगा. बीजेपी को इससे बड़ा नुकसान होने का अंदेशा था. लेकिन मंगलवार (15 मई) को आए चुनाव नतीजों ने सभी को चौंका दिया. नतीजों से साफ हो रहा है कि लिंगायत समुदाय का वोट बड़ी संख्‍या में बीजेपी के पाले में गया. लिंगायत समुदाय के प्रभाव वाले क्षेत्रों की कुल विधानसभा सीटों में से 44 सीटों पर बीजेपी आगे चल रही है. विश्‍लेषकों का मानना है कि लिंगायत समुदाय को अपना फायदा बीजेपी में गए बीएस येदियुरप्‍पा में ही दिखा. इसलिए येदियुरप्‍पा का फायदा बीजेपी को मिला.

बीजेपी ने चुनाव से पहले लिंगायत समुदाय को लेकर कांग्रेस की प्रदेश सरकार की ओर से पास प्रस्‍ताव का विरोध किया था. बीजेपी का कहना था कि इससे समाज में बंटवारा होगा और सामाजिक-आर्थिक स्‍तर पर इसका असर देखने को मिलेगा. कुछ का तो यही मानना था कि कांग्रेस ने ऐसा सिर्फ चुनावों में जीत हासिल करने के लिए किया है. लेकिन कांग्रेस की ऐसा मानना गलत ही साबित हुआ. कर्नाटक की 224 विधानसभा सीटों में से 100 सीटों पर लिंगायत समुदाय का प्रभाव है. वहीं प्रदेश की कुल जनसंख्‍या में लिंगायत समुदाय की हिस्‍सेदारी करीब 17 फीसदी है. माना जा रहा है कि कांग्रेस का ऐसा मानना था कि धार्मिक कार्ड के रूप में लिंगायत कार्ड खेला था. पार्टी का यह भी मानना था कि इससे बीजेपी का वोट बेस भी कट जाएगा और मतदाता बीएस येदियुरप्‍पा से दूर होंगे. लिंगायत समुदाय के नेता येदियुरप्‍पा बीजेपी में हैं.

कर्नाटक चुनाव के नतीजों के अनुसार कांग्रेस का प्‍लान उसकी योजना के अनुरूप काम नहीं किया. बीजेपी प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी. मध्‍य और उत्‍तरी कर्नाटक में लिंगायत प्रभाव वाली सीटों पर बीजेपी ने बढ़त बनाई. 2013 में हुए विधानसभा चुनावों में लिंगायत समुदाय ने कांग्रेस को ही वोट दिया था. उन चुनावों में कांग्रेस ने लिंगायत समुदाय के प्रभाव वाले क्षेत्रों में 67 फीसदी सीटें जीती थीं. 2013 के चुनावों में लिंगायत समुदाय के प्रभाव वाले क्षेत्रों में कांग्रेस ने 47 सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी ने इन क्षेत्रों में महज पांच सीटें ही हासिल की थी. 2008 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों की तुलना में कांग्रेस ने 2013 में करीब दोगुनी सीटें जीती थीं.

राजनीतिक विश्‍लेषक लिंगायत को एक जातीय पंथ मानते हैं, न कि एक धार्मिक पंथ. राज्य में ये अन्य पिछड़े वर्ग में आते हैं. अच्छी खासी आबादी और आर्थिक रूप से ठीकठाक होने की वजह से कर्नाटक की राजनीति पर इनका प्रभावी असर है. अस्सी के दशक की शुरुआत में रामकृष्ण हेगड़े ने लिंगायत समाज का भरोसा जीता. हेगड़े की मृत्यु के बाद बीएस येदियुरप्पा लिंगायतों के नेता बने. 2013 में बीजेपी ने येदियुरप्पा को सीएम पद से हटाया तो लिंगायत समाज ने भाजपा को वोट नहीं दिया. नतीजतन कांग्रेस फिर से सत्ता में लौट आई. अब बीजेपी फिर से लिंगायत समाज में गहरी पैठ रखने वाले येदियुरप्पा को सीएम कैंडिडेट के रूप में आगे रख रही है. अगर कांग्रेस लिंगायत समुदाय के वोट को तोड़ने में सफल होती है तो यह कहीं न कहीं बीजेपी के लिए नुकसानदेह साबित होगी.

एक दशक से हो रही मांग
समुदाय के भीतर लिंगायत को हिंदू धर्म से अलग मान्यता दिलाने की मांग समय-समय पर होती रही है. लेकिन पिछले दशक से यह मांग जोरदार तरीके से की जा रही है. 2011 की जनगणना के वक्त लिंगायत समुदाय के संगठनों ने अपने लोगों के बीच यह अभियान चलाया कि वे जनगणना फर्म में अपना जेंडर न लिखें.

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