सत्ता की आहट भर से क्यों बौरा जाते हैं कांग्रेस के नेता…?

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विशेष संवाददाता
रायपुर (नवप्रदेश)। कांग्रेस के सीनियर लीडर व नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव का कहना है कि डॉ. रमन सिंह 15 साल से मुख्यमंत्री हैं अब उनकी बारी है। बात कुछ हजम नहीं हुई। सबसे पहली बात तो यह कि मुख्यमंत्री पद किसी को बारी-बारी से नहीं मिलता। यह तो सरकारों की चाल और चरित्र से तय होता है। यदि किसी सरकार की चाल जनता को रास नहीं आई तो उसका जाना तय है। और रास आ गई तो अगले पांच साल का कार्यकाल मिलना भी तय है। डॉ. रमन सिंह व उनकी पार्टी अपने कार्यों के बल व विपक्ष की कमजोरी की वजह से लगातार 15 साल से सत्ता में है। कांग्रेस उनकी सत्ता को छिनने पिछले दस साल से प्रयासरत है लेकिन सफलता नहीं मिल रही है। इसके पीछे ऐेसे तो अनेक कारण हैं लेकिन मुख्यत: मुख्यमंत्री पद को लेकर कांग्रेस नेताओं की समय पूर्व लार टपकाने की कुप्रवृत्ति व अनर्गल दावे हंै। वर्ष 2008 व 2013 के विधानसभा चुनाव में अजीत जोगी मुख्यमंत्री पद की रट लगाए रहे। इस वजह से कांग्रेस जीतती बाजी हारती रही। अजीत जोगी के तीन साल के कार्यकाल से जनता एक तरह से त्रस्त हो गई थी। इसीलिए वर्ष 2003 के चुनाव में जनता ने कांग्रेस को खारिज कर दिया। इस चुनाव में अजीत जोगी की तुलना में डॉ. रमन सिंह के रूप में जनता को सौम्य चेहरा मिला। इसीलिए डॉ. रमन व उनकी पार्टी का वरन जनता करती रही है। अब अजीत जोगी कांग्रेस से निकल कर खुद की पार्टी बना चुके है। वहां भी वे मुख्यमंत्री बनने के सपने पाले हुए हैं। जोगी की गलत ट्रैक पर चलने वाली गाड़ी को रोकने तब कांग्रेस में किसी की हिम्मत नहीं थी इसलिए कांग्रेस सब कुछ जानने के बाद भी चुपचाप पराजय को अंगीकार करते रही। जोगी के पार्टी से निकलने के बाद दिल्ली दरबार सहित सूबे के तमाम कांग्रेस नेताओं को लगने लगा कि इस बार बगैर सीएम पद की लड़ाई कांग्रेस चुनावी मैदान में उतरेगी और जीतने में सफल हो जाएगी। लेकिन पिछले एक साल से मुख्यमंत्री पद को लेकर सर फुटौव्वल मची हुई है। इससे लगता है कांग्रेस में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते सबसे पहले परोक्ष रूप से भूपेश बघेल मुख्यमंत्री की दौड़ में खुद को आगे मान कर चल रहे थे। उन्होंने चरणदास महंत की तरह ही जुबान से कुछ नहीं बोला लेकिन उनके मौन व व्यवहार से सभी को लगने लगा कि वे मुख्यमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार हैं। कुछ हद तक यह अतीत में कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते रहे हैं। इनके इस तरह से भाव को पढ़ते हुए करीब छह माह पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. चरणदास महंत ने भी खुद को परोक्ष रूप से प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया। उन्होंने इसके लिए गुटबाजी जैसा माहौल बनाना शुरू कर दिया था। इससे लगने लगा कि महंत ही आगे चल कर कांग्रेस के मुख्यमंत्री बनेंगे। महंत के इस खेल से खत्म हो चुकी गुटीय राजनीति एक बार फिर अंगड़ाई लेने लगी थी। करीब चार माह पूर्व प्रदेश के प्रभारी महासचिव पीएल पुनिया ने मोर्चा संभाला और हालात को देखते हुए बड़े नेताओं को विधानसभा चुनावी समितियों में एडजस्ट कर स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री पद के लिए चेहरे का चयन चुनाव बाद किया जाएगा। इसके बाद लगा कि कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर झगड़ा शांत हो गया है लेकिन यह सतही था। पुनिया के प्रयास के बाद आग तो शांत हो गई लेकिन तपिश बाकी रह गई थी। यह टीएस सिंहदेव के रूप में बाहर आ गई। सिंहदेव का कहना है कि इस बार वे मुख्यमंत्री बनेंगे। उनका बयान सियासी मुकाम के लिहाज से सहीं हो सकता है लेकिन पार्टीलाइन के अनुरूप सहीं नहीं है। दरअसल भाजपा के नेता अब तक यही प्रचारित करते रहे हैं कि कांग्रेस में जमकर गुटबाजी है। इससे उनकी पार्टी को अतीत में बड़ी सफलता मिलती रही है। उनकी बातों को कांग्रेस के नेता सच साबित कर पराजित होते रहे हैं। इस वजह से जनता में यह संदेश जाता रहा है कि कांग्रेस में गुटबाजी है, इसलिए जिताना ठीक नहीं है। सवाल यह है कि कांग्रेस के नेता बगैर सूत कपास के लठ्ठम लठ्ठा क्यों करते हैं? सूबे की सियासी सूरत सत्ता पविर्तन की ओर दिख रही है, जब भी इस तरह के संकेत जनता से मिलना शुरू होते है कांग्रेस के तमाम बड़े नेता मुख्यमंत्री पद के लिए बौरा जाते हैं और अनर्गल बयानबाजी कर पूरा माहौल बिगाड़ देते हैं। सिंहदेव ने जिस ढंग से बयान दिया है, वह समय के लिहाज से माकूल नहीं है। बेहतर है कांग्रेस नेता वक्त का इंतजार कर चुनाव परिणाम के बाद अपने पत्ते खोलें अन्यथा पिछले दो चुनावों की तरह जीतती बाजी एक बार फिर हार सकते हैं।

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