छत्तीसगढ़ विधानसभा में होगा महासंग्राम : अहम सवाल क्या विपक्ष बृजमोहन का इस्तीफा ले पाएगा..?

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विशेष संवाददाता
रायपुर(नवप्रदेश)। विधानसभा का पावस सत्र मंगलवार से आरंभ होने जा रहा है। यह बेहद खास रहेगा। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के 13 साल के कार्यकाल में पहली बार भ्रष्टाचार के मामले में विपक्ष के निशाने पर कोई मंत्री आया है। कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की पत्नी व बेटे के नाम में गैरवाजिब ढंग से जमीन खरीदी के साथ ही शासकीय जमीन कब्जाने का आरोप है। यहीं नहीं सरकारी धन पर बने मनरेगा की सड़क व बिजली लाइन को भी कब्जा करने का आरोप है। वहां उनका परिवार रिसार्ट बनवा रहा है। इससे कुछ लघुतर आरोप प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भूपेश बघले के परिजनों पर लगे थे। तब सरकार ने ताबड़तोड़ जांच कराई थी। बरसते पानी में खेतों की जरीब लेकर माप की गई। जांच पूरी हो गई तो भूपेश बघेल के परिवार द्वारा शासकीय जमीन कब्जा किए जाने की रिपोर्ट राजस्व मंत्री प्रेमप्रकाश पांडे ने बकायदा प्रेस कांफ्रेंस लेकर सार्वजनिक की थी। तब पूरी सरकार का रुख कुछ ऐसा था मानो उनकी ईमानदारी को बेईमानी कर भूपेश बघेल के परिवार के सदस्यों ने आहत किया हो। इससे भी जी नहीं भरा तो भिलाई-3 स्थित उनके निवास के दस्तावेजों की जांच कराने आदेश जारी किया गया। मामला ईओडब्ल्यु तक ले जाया गया। अब सरकार के सीनियर मंत्री इससे भी बड़े मामले में घिर चुके हैं। क्या सरकार भूपेश बघेल के परजिनों के मामले की तरह ताबड़तोड़ जांच कराएगी और प्रेस कांफ्रेंस लेकर सार्वजनिक करेगी? नहीं। कदापि नहीं। दरअसल भाजपा अपने नेताओं को गरदन तक भ्रष्टाचार में डूबे रहने पर भ्रष्ट नहीं मानती। भाजपा के नेता खुद को ईमानदार प्रचारित करते हंै लेकिन ऐसा नहीं है। सूबे के एक-एक मंत्री व विधायक कुबेर बन चुके हैं। इसके बाद भी वे कांग्रेस के नेताओं को भ्रष्ट व घोटालेबाज घोषित करते रहते हैं। खैर, लंबे अरसे से खार खाए विपक्ष के हाथों सरकार को घेरने अहम मामला हाथ लगा है। झीरम घाटी हत्याकांड व नसबंदी कांड के बाद यह पहला मौका है जब सरकार विपक्ष के सम्मुख रक्षात्मक मुद्रा में है। जाहिर है विधानसभा के पावस सत्र के पहले दिन से ही सत्ता पक्ष व विपक्ष के बीच बृजमोहन अग्रवाल के परिजनों के जमीन घोटाले को लेकर महासंग्राम छिड़ेगा। विपक्ष कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के इस्तीफे से कम नहीं चाहेगा जबकि सरकार मामले की जांच के आदेश देने की कैफियत के साथ रफा-दफा करना चाहेगी। जब मध्यप्रदेश के संगठित व्यापम घोटाले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह व उनके मंत्रिमंडल से सहयोगियों पर आंच नहीं आई तो फिर बृजमोहन अग्रवाल का सवाल ही नहीं उठता। वे पाक-साफ घोषित किए जाएंगे और मंत्री बने रहेंगे। सत्ता पक्ष की कोशिश रहेगी कि पिछले बड़े मुद्दों की तरह इस मामले को भी जल्द शांत कराया जाए। इसमें वे सफल हो सकते हैं। विपक्ष कुछ भी नहीं कर पाएगा, लेकिन यह सूबे की जनता के लिए ठीक नहीं है। ऐसे भी अधिकांश मंत्री इन 13 वर्षों में अकूत संपत्ति बना चुके है। यदि विपक्ष इस मामले को अंजाम तक नहीं ले जा पाया तो सरकार स्तर पर भ्रष्टाचार और बढ़ सकता है। इसे रोकने सरकार की तगड़ी घेरेबंदी विपक्ष को करनी होगी। आमतौर पर विपक्षी दल कांग्रेस के नेता हर मसले पर बाहर होहल्ला करते हैं लेकिन सदन में ढेर हो जाते हैं। इस मसले के साथ भी यहीं हुआ तो एक और बड़ा मसला दफन हो जाएगा। झीरम घाटी, नसबंदी कांड आदि के साथ ऐसा हो चुका है। बृजमोहन अग्रवाल के मामले में नतीजे चाहिए तो विपक्षी विधायकों को शांत भाव से सरकार की घेरेबंदी करनी होगी। विपक्ष के विधायक होहल्ला व बर्हिगमन के बजाय सदन में रह कर सरकार पर दबाव बनाए तो परिणाम निकल सकता है। सत्र के पूर्व दिवस इस मसले को लेकर सत्ता पक्ष व विपक्ष की ओर से देर रात मंत्रणा चलती रही। कांग्रेस की कमजोरी की वजह से सत्ता पक्ष मनमर्जी अनुसार सदन चला कर विधानसभा सत्र को समापन तक ले जाते रहे हैं। और बड़े मसले विधानसभा की पटल पर दम तोड़ते रहे हैं। भाजपा का चरित्र खुद को पाक साफ व विपक्ष को घोटालेबाज करार देता रहा है। इसके पूर्व भी विधानसभा की पटल में मामले आए लेकिन सरकार ने किसी भी मामले में खुद की गलती नहीं मानी। चाहे वह नक्सल हमले में जवानों व नागरिकों की मौत हो, आंख फोड़वा कांड हो अथवा मानिकचौरी व अन्य ग्रामों में महिलाओं की कोख काटने का कांड। विपक्ष कमजोर रहा है। यह सरकार की सफलता और विपक्ष की विफलता है। नारेबाजी व बर्हिगमन को कर्तव्य मान लिया जाता है। यदि विपक्ष गंभीरता से सरकार को घेरता है तो मामले में भले सरकार को आंच न आए लेकिन कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की कुर्सी हिल सकती है। जरूरत विपक्ष के सही तरीके से मामले को हैंडल करने की है।

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