कांग्रेस में थके हारे नेताओं के दिन लदेंगे…

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  • बस्तर प्रवास पर राहुल गांधी ने दिए संकेत

विशेष संवाददाता
रायपुर (नवप्रदेश)। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी करीब चार साल के बाद छत्तीसगढ़ में सत्ता की कुंजी यानि 12 सीटों वाले बस्तर पहुंचे। इस दौरे में वे छत्तीसगढ़ फहत करने सियासत के कई पाठ पढ़ाए लेकिन अहम बात यह कह गए कि इस बार विधानसभा चुनाव में पुराने खप चुके, थके-हारे नेताओं की जगह ऊर्जावान युवा नेता लेंगे। इससे लग रहा है कि कांग्रेस भी भाजपा की तरह बड़े पैमाने पर नए चेहरे मैदान में उतारेगी। राहुल गांधी ने खुले रूप से कहा कि इस बार चुनाव में युवाओं को अधिक टिकट दिए जाएंगे। इसके लिए युवक कांग्रेस के नेताओं को तैयार रहने कहा है। साफ है कांग्रेस पारंपरिक नेताओं को झटक कर बड़ा गेमप्लान करने जा रही है। पिछले कई चुनावों से कांग्रेस एक ही चेहरे को चुनाव लड़ाते रही है। इससे पार्टी की जड़ें खोखली हो गईं। राहुल गांधी इन जड़ों को फिर पुष्पित करने जा रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो कांग्रेस के लिए शुभ संकेत है। पिछले कई सालों से आलम यह है कि खप चुने नेताओं की टिकट के कतार में बने रहने से नए नेता पनप ही नहीं सके। विधायक व पूर्व विधायक विधानसभा क्षेत्र को खुद की मिल्कियत मान कर व्यवहार करते रहे हैं। उनके इलाके में कोई और नेता दावेदारी की हिम्मत नहीं दिखे सके। किसी ने ऐसा कर दिया तो उसकी राजनीति समाप्त कर दी जाती थी। इसके चलते सूबे के अधिकांश विधानसभा क्षेत्र में टिकट पाने की आस तो दूर कोई सोच भी नहीं पाता था। कांग्रेस की पराजय का यह सबसे बड़ा कारण रहा है। राहुल गांधी इन नेताओं को टिकट के मैदान से खदेडऩे की हिम्मत दिखाते हैं तो कांग्रेस को नया जीवन मिल सकता है। बस्तर दौरे पर राहुल गांधी कांग्रेस को पुष्पित करने एक और घोषणा कर गए कि इस बार पंजाब की तरह टिकट वितरण आठ माह पहले कर दिए जाएंगे। यह कांग्रेस की जीत का बड़ा आधार बन सकता है। वर्ष 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में अंतिम 48 घंटे में 28 प्रत्याशियों के टिकट बदले गए थे। सभी सीटों में कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा। छत्तीसगढ़ में पिछले लोकसभा चुनाव में रायपुर लोकसभा सीट की टिकट तीन बार बदले गए, पराजय मिली। यह कांग्रेस के लिए सबक है। संभवत: इसी बात को भांप कर राहुल गांधी आठ माह पहले टिकट देने की बात कही है। ऐेसा होता है तो खुलाघात व भितरघात करने वाले नेताओं की दुकानदारी बंद हो सकती है। कोशिश भी की तो वक्त इतना अधिक होगा कि संभावित क्षति की पूर्ति की जा सकेगी। इससे कांग्रेस की सूबे में जीत की संभावना बन सकती है। राहुल गांधी छत्तीसगढ़ को खंदक की लड़ाई मान कर चल रहे हैं। इसलिए जीत के लिए पुरजोर प्रयास कर रहे हैं। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के पूर्व छत्तीसगढ़ सहित भाजपा शासित तीन राज्यों मध्यप्रदेश व राजस्थान में भी चुनाव होना है। इन तीनों ही राज्यों में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अपेक्षाकृत बेहतर पोजिशन में है। बस्तर दौरे में राहुल गांधी ने स्थानीय समीकरणों को भी साधने की पूरी कोशिश की। राहुल ने कार्यकर्ताओं-पदाधिकारियों को भाजपा पर हमला करने 30 सवाल भी दिए। जिसे गांव-गांव जाकर भाजपाइयों के भ्रष्टाचार, काला धन, विमुद्रीकरण, महंगाई, कश्मीर मसला, पाकिस्तान, गो-रक्षकों के हिंसक रवैये और मुस्लिम महिलाओं के मामले में विफलता की गाथा बताने कहा है। साथ ही भाजपा द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम को दूर कर कर मुंहतोड़ जवाब देने कहा है। इसे कांग्रेस के पदाधिकारी व कार्यकर्ता अंजाम देंगे ऐसा नहीं लगता। अब तक जो होता आया है उसके अनुसार शीर्ष नेता दिल्ली के लिए उड़ान भरे नहीं कि कांग्रेस के नेता अपने घरों में दुबक जाते हैं। इस बार भी ऐसा हो सकता है। इस दौरे में राहुल गांधी आदिवासयों से मुलाकात कर नए किस्म की सियासत की। साथ ही उन्होंने अपने पुरखों के बस्तर प्रवास व गांधी परिवार के लोगों में आदिवासी प्रेम को बताने में कसर नहीं छोड़ी। बस्तर के विधानसभा क्षेत्र बीजापुर, चित्रकोट, बस्तर और नारायणपुर के पार्टी सेक्टर प्रभारियों, युवा कांग्रेस और महिला कांग्रेस नेताओं से मुलाकात कर कांग्रेस के लिए माहौल बाने की पूरी कोशिश की। नगरनार स्टील प्लांट से प्रभावित आदिवासियों के मसले अहम नहीं था इसके पीछे आदिवासियों पर मरहम लगाना व साधना प्रमुख मकसद था। उन्होंने प्रदेश के 29 विधानसभा क्षेत्र वाले आदिवासी समाज को पार्टी से जोडऩे कोशिश पार्टी नेताओं को निर्देश दिए। लोहंडीगुड़ा में टाटा समूह की प्रस्तावित परियोजना से बेदखल हुए लोगों से भी राहुल गांधी ने मुलाकात की। उन पर मरहम लगाते हुए उन्होंने उनकी लड़ाई को मुकाम तक पहुंचाने का भरोसा दिलाया। राहुल गांधी को उम्मीद है कि आदिवासी समीकरण के सहारे वह बस्तर में पार्टी की पकड़ मजबूत बना सकेंगे। एक बात तो साफ है छत्तीसगढ़ में कांग्रेस देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा मजबूत है। यह बात विभिन्न चुनावों में साबित हो चुकी है। पिछले दो विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय प्रत्याशी चयन व अजीत जोगी का चेहरा परोक्ष रूप से सामने रखने की वजह से हुई। कुछ सीटें जीत के करीब पहुंच कर पराजय मिली थी। मतों का प्रतिशत भी भाजपा से 0.76 प्रतिशत ही कम रहा। यदि कांग्रेस पुराने नेताओं की जगह नए नेताओं को टिकट देती है तो इस कमी को पूरा की जा सकती है। भाजपा पिछल तीन चुनावों से बड़े पैमाने पर चेहरे बदलने की वजह से जीत रही है। और कांग्रेस बड़े पैमाने पर पुराने नेताओं को रिपीट कने की वजह से हार रही है। इसे राहुल गांधी समझ चुके हैं। इसलिए प्रत्याशी चयन में पिछली गलतियां नहीं दोहराएंगे। जाति समीकरण साधने की दिशा में भी कांग्रेस बढते दिख रही है। अनुसूचित जाति, आदिवासी व पिछड़ा वर्ग के दो नेताओं को बेहतर मौके देने के प्लान बनाए जा रहे हैं। इससे कांग्रेस काफी हद तक जमीनी मजबूती हासिल कर सकती है, बशर्ते पार्टी के नेता व कार्यकर्ता सीधे जनता तक पहुंच बनाएं। अभी कंाग्रेस के नेता जनता से करीबी बना कर नहीं चल रहे हैं। राहुल के बस्तर दौरे से साफ है कि कांग्रेस अपने पुराने किलों को हासिल करने जोर लगा रही है।

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